जब महिलाओं का पढ़ना था पाप, तब Savitribai Phule ने कैसे की शिक्षा की शुरुआत?
Savitribai Phule Jayanti : आज जब हम किसी बेटी को स्कूल जाते या दफ्तर में बड़े पदों पर काम करते देखते हैं, तो इसकी नींव में उस संघर्ष की कहानी छिपी है जो आज से लगभग पौने दो सौ साल पहले पुणे की गलियों में शुरू हुआ था। 3 जनवरी 1848 को जब सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) ने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर ‘भिड़े वाड़ा’ में देश का पहला महिला स्कूल खोला, तो वे केवल अक्षर नहीं सिखा रही थीं, बल्कि सदियों की मानसिक गुलामी की बेड़ियों को काट रही थीं।
दो साड़ियों की वो अनकही कहानी
सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) जब घर से स्कूल के लिए निकलती थीं, तो रास्ते में लोग उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंकते थे। रूढ़िवादी समाज को एक महिला का पढ़ना और पढ़ाना ‘धर्म भ्रष्ट’ करने जैसा लगता था। लेकिन सावित्रीबाई का साहस देखिए—वे अपने झोले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं। स्कूल पहुँचकर वे गंदी साड़ी बदलतीं और फिर शांत भाव से लड़कियों को पढ़ाने बैठ जातीं। उन्होंने अपमान सहा, लेकिन अपनी छात्राओं के भविष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने सिखाया कि बदलाव लाने के लिए पहले खुद को तपाना पड़ता है।
केवल शिक्षा नहीं, सामाजिक न्याय का शंखनाद
सावित्रीबाई (Savitribai Phule) का संघर्ष केवल किताबों या क्लासरूम तक सीमित नहीं था। उन्होंने देखा कि समाज में विधवाओं की स्थिति नारकीय थी और उनका मुंडन कर दिया जाता था। इसके विरोध में सावित्रीबाई ने पुणे में नाइयों की एक विशाल हड़ताल आयोजित करवाई, ताकि वे विधवाओं के बाल न काटें। उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला, जहाँ समाज द्वारा तिरस्कृत गर्भवती विधवाओं को आश्रय मिला। उन्होंने न केवल एक ब्राह्मण विधवा के बेटे (यशवंत) को गोद लिया, बल्कि उसे पाल-पोसकर डॉक्टर भी बनाया।
सत्यशोधक समाज और छुआछूत पर प्रहार
जातिवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई शब्दों तक सीमित नहीं थी। उस दौरान दलितों को पानी तक के लिए तरसना पड़ता था। जब दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी पीने की मनाही थी, तब सावित्रीबाई (Savitribai Phule) ने अपने घर का पानी का हौज (टैंक) उनके लिए खोल दिया। उन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर ‘सत्यशोधक समाज’ के जरिए छुआछूत के खिलाफ मोर्चा खोला।
उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के माध्यम से बिना ब्राह्मण और बिना किसी कर्मकांड के विवाह करने की परंपरा शुरू की, जिसे ‘सत्यशोधक विवाह’ कहा गया। उनका मानना था कि आत्मसम्मान के लिए शिक्षा और तर्क जरूरी है। यह उस समय के कट्टरपंथी समाज के मुंह पर सबसे करारा तमाचा था।
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प्लेग की वो काली रात
सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) का अंत भी उनके जीवन की तरह ही महान था। उनकी मृत्यु भी उनके जीवन की तरह ही परोपकारी थी। 1897 में पुणे में जब प्लेग की महामारी फैली, तो 66 वर्ष की उम्र में भी वे मरीजों की सेवा में जुटी रहीं। एक बार वे प्लेग से पीड़ित पांडुरंग गायकवाड़ के बच्चे को कंधे पर लादकर अस्पताल ले जा रही थीं। इसी दौरान वे खुद संक्रमण की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
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सर्वोच्च बलिदान
बहुत कम लोग जानते हैं कि सावित्रीबाई (Savitribai Phule) एक प्रखर कवयित्री भी थीं। उनकी रचना ‘काव्य फुले’ समाज को जागरूक करने का एक सशक्त माध्यम बनी।
सावित्रीबाई फुले ने हमें सिखाया कि बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती। पत्थर खाने पड़ते हैं, कीचड़ झेलना पड़ता है, लेकिन अगर इरादा नेक हो तो इतिहास बदल जाता है। आज की पीढ़ी के लिए वे केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक हैं।



