अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय है। यह न सिर्फ सपा को मजबूत बनाता है, बल्कि पूरे समाज को न्याय, एकता और विकास का रास्ता दिखाता है। उत्तर प्रदेश में यह फार्मूला जातीय बेडि़यां तोड़ने का काम कर रहा है। अगर यह फॉर्मूला जमीन पर सही तरीके से लागू हुआ तो UP और भारत में सामाजिक परिवर्तन की नींव रख सकता है। सही मायने में पीडीए ही भारत में सामाजिक परिवर्तन का नया अध्याय लिखेगा। PDA जरूरी है क्योंकि एकजुट वंचित वर्ग ही असली लोकतंत्र और समृद्धि की गारंटी है।
अचानक कैसे आया पीडीए फार्मूला
PDA फॉर्मूला का अर्थ और उत्पत्ति
यह फॉर्मूला घोसी विधानसभा उपचुनाव (2023) से पहले “अबकी बार पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक (PDA) सरकार” नारे के साथ शुरू हुआ। अखिलेश ने इसे NDA के खिलाफ “PDA ही NDA को हराएगा” का नारा दिया। यह सपा की पुरानी M-Y रणनीति का विस्तार है, जिसमें यादव (लगभग 12-15%) और मुस्लिम (20%) मुख्य थे। PDA में गैर-यादव OBC (40-50% आबादी), दलित (20%) और अन्य अल्पसंख्यक (सिख, बौद्ध, ईसाई आदि सहित) शामिल हो गए। इसका मकसद भाजपा की “ऊपरी जाति + गैर-यादव OBC” रणनीति को तोड़ना और 85% से ज्यादा वंचित वर्गों को एकजुट करना था।
PDA फॉर्मूला से समाज को मिल रही नई दिशा
जो पीडि़त वही पीडीए
PDA फॉर्मूला क्यों जरूरी है?
2024 लोकसभा चुनाव में PDA की सफलता
PDA ने INDIA गठबंधन को UP में मजबूती दी और भाजपा की सीटें 62 से घटाकर 33 कर दीं। अखिलेश ने दावा किया कि PDA के कारण भाजपा के “समीकरण और फॉर्मूले” फेल हो गए। आगे आने वाले 2027 के चुनाव में बीजेपी के सारे समीकरण फेल हो जाएंगे।



