आज 11 अप्रैल 2026 को पूरे देश में महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले (जिन्हें प्यार से ज्योतिबा फुले या क्रांतिसूर्य महात्मा फुले कहा जाता है) की 199वीं जयंती मनाई जा रही है। वे 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के कटगुण गांव में एक माली परिवार में जन्मे थे।
19वीं सदी में जब ब्रिटिश राज था और भारतीय समाज जातिवाद, छुआछूत, स्त्री अशिक्षा और अंधविश्वास की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब ज्योतिबा फुले ने शिक्षा को मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार बनाकर क्रांति की शुरुआत की। उन्होंने न केवल भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला, बल्कि सत्यशोधक समाज की स्थापना कर जातिवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ खुला मोर्चा खोला।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
ज्योतिबा का जन्म एक साधारण माली (माली समुदाय) परिवार में हुआ। पिता गोविंदराव फुले खेती और फूलों का काम करते थे। बचपन में ही परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा, लेकिन एक समझदार ब्राह्मण शिक्षक की मदद से उन्होंने शिक्षा जारी रखी।
वे पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल से पढ़े और अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी के साथ-साथ इतिहास, गणित और विज्ञान में निपुण हुए। 1848 में उन्होंने थॉमस पेन की किताब Rights of Man पढ़ी, जिसने उनके विचारों को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या जाति व्यवस्था और स्त्री शोषण है।
सावित्रीबाई फुले के साथ क्रांतिकारी यात्रा
ज्योतिबा की पत्नी सावित्रीबाई फुले (जन्म: 3 जनवरी 1831) उनके संघर्ष की सबसे मजबूत साथी रहीं। 1840 में विवाह के समय सावित्रीबाई मात्र 9-10 वर्ष की थीं, लेकिन ज्योतिबा ने उन्हें घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया।
3 जुलाई 1848 को पुणे के भिडेवाड़ा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला गया। सावित्रीबाई इस स्कूल की पहली शिक्षिका बनीं और बाद में भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में इतिहास रचा। शुरू में सिर्फ 9 लड़कियां थीं, लेकिन समाज के कट्टर विरोध के बावजूद उन्होंने 18 स्कूल स्थापित किए। दलित-शूद्र बच्चों और महिलाओं के लिए अलग-अलग स्कूल और रात के स्कूल भी चलाए गए।
विरोध इतना तीव्र था कि सावित्रीबाई स्कूल जाते समय पत्थरों और गंदे पानी का सामना करती थीं। उन्होंने छाते के साथ जाना शुरू किया ताकि रास्ते में पड़ी गंदगी साफ कर सकें।

सत्यशोधक समाज की स्थापना (1873)
24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य था:
- सत्य की खोज
- जातिवाद, छुआछूत और ब्राह्मणवाद का अंत
- शूद्रों, अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों को शिक्षा व अधिकार दिलाना
समाज के सदस्यों को शपथ लेनी पड़ती थी कि वे जाति-पाति और छुआछूत का त्याग करेंगे। इस संगठन ने विधवा विवाह, बाल विवाह विरोध, मंदिर प्रवेश और किसान अधिकार जैसे मुद्दों पर काम किया।
प्रमुख पुस्तकें और विचार
ज्योतिबा फुले ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं:
- गुलामगिरी (1873) — उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना। इसमें उन्होंने ब्राह्मणों को “आर्य आक्रमणकारी” बताया और शूद्रों को इस देश के मूल निवासी माना।
- शेतकर्याचा आसूड (1883) — किसानों की दुर्दशा और शोषण पर।
- सार्वजनिक सत्यधर्म — सभी धर्मों का सार निकालने वाली पुस्तक।
- त्रिवर्ण — सामाजिक असमानता पर।
उनका मूल मंत्र था: “शिक्षा ही असली मुक्ति है। बिना शिक्षा के कोई भी समाज ऊंचा नहीं उठ सकता।”
अन्य क्रांतिकारी कार्य
- अपने घर के कुएं को सभी जातियों के लिए खोल दिया (पहला ऐसा कुआं)।
- विधवा आश्रम स्थापित किया।
- बाल विवाह और सती प्रथा का खुला विरोध।
- बलात्कार पीड़ित महिलाओं और गर्भवती विधवाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह खोला।
- किसानों के लिए भूमि अधिकार और कर मुक्ति की मांग की।

अंतिम वर्ष और निधन
1888 में उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई। उसी वर्ष एक स्ट्रोक से वे पक्षाघात से ग्रस्त हो गए। 28 नवंबर 1890 को पुणे में उनका निधन हुआ। मरते समय उन्होंने कहा था कि मेरा अंतिम संदेश शिक्षा, समानता और न्याय है।
सावित्रीबाई फुले ने पति की मृत्यु के बाद भी सत्यशोधक समाज को आगे बढ़ाया। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने पीड़ितों की सेवा की और खुद प्लेग से संक्रमित होकर 10 मार्च 1897 को शहीद हुईं।
आज की प्रासंगिकता
ज्योतिबा फुले का योगदान आज भी उतना ही प्रासंगिक है:
- जातिवाद अभी भी समाज में मौजूद है — उन्होंने 180 साल पहले इसकी जड़ों पर प्रहार किया।
- लड़कियों की शिक्षा आज भी कई इलाकों में चुनौती बनी हुई है।
- मानसिकता सुधार — शिक्षा के बिना कोई क्रांति संभव नहीं, यही उनका सबसे बड़ा संदेश है।
- डॉ. भीमराव आंबेडकर ने फुले के विचारों को आगे बढ़ाया और बहुजन आंदोलन की नींव रखी।
ज्योतिबा फुले का सपना था — एक ऐसा भारत जहां जाति, लिंग, धर्म या वर्ग की कोई दीवार न हो। सिर्फ शिक्षा, समानता और न्याय हो।
जय ज्योतिबा! जय सावित्रीबाई!



