इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर महादेव मंदिर: 300 लाख साल पुराने पत्थरों से बिना सीमेंट के निर्माण, अखिलेश यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट

इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में लोहन्ना चौराहे से ग्वालियर रोड की तरफ बढ़ते ही एक विशाल मंदिर का शिखर नजर आता है। लायन सफारी पार्क के सामने बन रहा यह भव्य मंदिर कुछ क्षणों के लिए भ्रम पैदा करता है कि कहीं उत्तराखंड का केदारनाथ मंदिर मैदानों में तो नहीं उतर आया।

लगभग 10 फीट ऊंचे चबूतरे पर काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी स्थापित हैं। नंदी की दृष्टि सीधे गर्भगृह की ओर है। इसके ठीक पीछे पत्थरों से ‘केदारेश्वर महादेव मंदिर’ आकार ले रहा है।

अखिलेश यादव का संकल्प और 28 जून का बयान

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि मंदिर पूरा होने के बाद वह सबसे पहले यहां भगवान शिव के दर्शन करेंगे। इसके बाद ही वह अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे।

हाल ही में 28 जून 2026 को प्रयागराज में अखिलेश यादव ने राज्य सरकार पर तीखा तंज कसा था। उन्होंने कहा, “जिनके लिए डोनेशन फर्स्ट है, नेशन नहीं है, मैं कई बार जवाब दे चुका हूं कि केदारेश्वर धाम इटावा में शिव मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम के दर्शन करने जाएंगे”। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए अखिलेश ने कहा कि जो मुख्यमंत्री अयोध्या जाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बना रहे थे, उन्हें वहां की असलियत की खबर नहीं है।

एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई कहानी

करीब 11 एकड़ में विकसित हो रहे इस मंदिर की कहानी किसी राजनीतिक रणनीति से नहीं, बल्कि एक नंदी की प्रतिमा से शुरू हुई थी। निर्माण कर रही आंध्र प्रदेश की कंपनी के निदेशक मधु बोट्टा के अनुसार, 2009 में अखिलेश यादव ने उनसे केवल एक विशाल नंदी प्रतिमा बनाने को कहा था।

अखिलेश यादव जब मैसूर के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते थे, तब वह चामुंडेश्वरी मंदिर जाते थे। वहां स्थापित काले ग्रेनाइट के नंदी ने उन पर गहरी छाप छोड़ी थी। वर्ष 2017 में मधु बोट्टा मैसूर स्थित नंदी की वैसी ही प्रतिकृति बनाकर इटावा लाए। इसे देखकर अखिलेश यादव इतने प्रभावित हुए कि यहीं से एक भव्य शिव मंदिर बनाने का विचार सामने आया।

 

शिव अक्ष रेखा और वास्तुकला का संगम

वर्ष 2018 में इटावा के शीतलपूर गांव में करीब दस बीघा जमीन खरीदी गई। मधु बोट्टा की टीम ने भौगोलिक अध्ययन में दावा किया कि यह स्थान ‘शिव अक्ष रेखा’ (ज्योतिर्लिंग अक्ष) पर स्थित है। यह वही काल्पनिक रेखा है जिस पर उत्तराखंड का केदारनाथ, श्रीकालहस्ती और रामेश्वरम जैसे मंदिर स्थित माने जाते हैं।

मंदिर के मुख्य गर्भगृह को उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर जैसा रूप दिया गया है। पूरा परिसर दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली से प्रेरित है।

https://youtu.be/P6NGymzaVp4

तीन लाख वर्ष पुराने पत्थर और बिना सीमेंट का निर्माण

केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण आधुनिक सामग्री से नहीं हो रहा है। इसमें लोहे या सीमेंट का बिल्कुल उपयोग नहीं किया गया है। पत्थरों को जोड़ने के लिए प्राचीन भारतीय ‘त्रिबंधन’ तकनीक अपनाई गई है। इसमें चूना, गुड़, केला, शहद और अन्य प्राकृतिक पदार्थों के विशेष मिश्रण का उपयोग होता है।

पूरा मंदिर तमिलनाडु के कन्याकुमारी से लाए गए विशेष ‘कृष्ण पुरुष शिला’ (ग्रेनाइट) से बनाया जा रहा है। इस पत्थर पर लोहे से प्रहार करने पर घंटी जैसी ध्वनि सुनाई देती है। निर्माण से जुड़े लोगों का दावा है कि इस पत्थर की आयु लगभग तीन लाख वर्ष है।

गर्भगृह की ऊंचाई लगभग 74 फीट है। चबूतरे सहित कुल ऊंचाई 84 फीट है, जो जानबूझकर मूल केदारनाथ मंदिर से लगभग एक इंच कम रखी गई है।

नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला

फरवरी 2024 में नेपाल की काली गंडकी नदी से एक शालिग्राम शिला लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय लाई गई थी। अखिलेश और डिंपल यादव ने पूरे वैदिक विधि-विधान से इसकी पूजा की थी। नेपाल के गरीबनाथ महादेव मंदिर से उपहार में मिली इस देवशिला को स्वयंभू शिवलिंग मानकर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया जा रहा है।

आस्था का नया केंद्र या सांस्कृतिक राजनीति?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब धार्मिक प्रतीकों की भूमिका निर्णायक हो गई है। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल न होने पर अखिलेश यादव को लगातार निशाना बनाया गया। उन पर हिंदू विरोधी राजनीति के आरोप लगे। अब समाजवादी पार्टी इटावा के इस मंदिर के जरिए यह संदेश दे रही है कि सामाजिक न्याय और धार्मिक आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

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